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समझदारी से भरा घड़ा- अकबर बीरबल कहानी २

एक दिन राजा अकबर और उसके दरबारी दरबार में बैठे थे, तभी राजा सिलोन के दरबार से एक दूत वहां आ पहुंचा. वह एक विशेष काम के लिए आया था. बादशाह अकबर ने उसका स्वागत किया. उसने बादशाह से कहा, “बादशाह, मुझे राजा सिलोन ने भेजा है. आप के दरबार में बहुत सारे बुद्धिमान दरबारी हैं और हमारे राजा ने समझदारी से भरे हुए घड़े की गुजारिश की है.”

उस राजदूत की बात सुनकर सभी दरबारी चकित हो गए. वे सभी आपस में कहने लगे कि, “सिलोन का राजा हमें मात देना चाहता है, इसीलिए ऐसी बेहूदा गुजारिश कर रहा है.” उन्हें यह भी लगने लगा कि अब इस परेशानी से बचाने के लिए बीरबल भी कुछ नहीं कर पाएगा.

तब अकबर बादशाह ने वजीर बीरबल से प्रश्न पूछा कि उसका इस बात के बारे में क्या कहना है?
बीरबल ने बड़े अदब से कहां, “जी जहांपनाह, हम सिलोन के राजा के लिए थोड़ी-बहुत समझदारी तो भेज ही सकते हैं, आखिरकार उन्होंने हमसे इस की गुजारिश की है, तो हमें उनकी यह इच्छा पूरी करनी ही चाहीए.”

बादशाह अकबर ने बीरबल की बात मानते हुए कहां, “अगर तुम कहते हो तो ठीक है. तुम जो भी करोगे ठीक ही करोगे. मुझे तुम पर पूरा यकीन है.” इस बात पर बीरबल में बादशाह का शुक्रिया अदा किया.
उसने बादशाह अकबर और राजदूत से घडों को भरने के लिए कुछ हफ्तों का वक्त मांग लिया.दोनों ने भी बीरबल को वक्त देने की मान्यता दे दी.

उसी शाम बीरबल के दिमाग में कमाल की योजना आयी. उसने अपने सहायक को बुलाया और उससे कुछ मिट्टी के ऐसे घड़े मंगवाए जिनकी गर्दन थोड़ी पतली और छोटी हो.
बीरबल जब तक बाहर बगीचे में बैठा अपनी योजना के बारे में सोच रहा था, तभी सहायक कुछ घड़े लेकर उसके पास आ गया.

बीरबल ने सहायक को घड़े लेकर अपने पीछे कद्दू की क्यारी में आने के लिए कहा.
उसने एक घड़ा उठाकर उसके आसपास कुछ लकड़िया लगा दी, ताकि वह जमीन में अच्छे से जम सके और फिर उसने वह घड़ा कद्दू के फूल पर रख दिया.उसने बाकी के घड़े भी कद्दू के फूलों पर रख दिए और सहायक से कहा कि, “इन सभी को अच्छे से पानी और खाद मिलता रहे और किसी को भी उसे छुने मत देना. मैं जल्द ही उन्हें लेने आऊंगा.” ऐसा कहकर बीरबल वहां से चला गया.

कुछ हफ्तों बाद बादशाह अकबर ने बीरबल से समझदारी के घड़ों के बारे में पूछा.
तब बीरबल ने कहां, “मैंने काम लगभग खत्म कर ही लिया है जहांपनाह. मुझे सिर्फ 2 हफ्ते की देरी और चाहिए. तब यह काम पूरा हो जाएगा. हम सिलोन के राजा के दूत को दो हफ्तों के बाद बुला सकते हैं.”

दो हफ्तों बाद सभी दरबारी दरबार में इकट्ठा हुए. सभी लोगों की भीड़ में हंसी सुनाई दे रही थी.
सभी की नजर बीरबल पर थी. सभी सोच रहे थी कि बीरबल किसी भी तरह घड़े को समझदारी से नहीं भर पाएगा.सभी बीरबल की चुनौती और उसके परिणाम के बारे में बातें कर रहे थे.

तभी बीरबल और राजदूत, बादशाह अकबर के सामने दरबार में हाजिर हुए.
अकबर ने बीरबल से पूछा कि क्या वह समझदारी से भरा घड़ा दिखाने के लिए तैयार है. बीरबल ने भी ‘हां’ कह कर उत्तर दिया.

सभी लोग इच्छुक थे कि बीरबल आखिर क्या दिखाना चाहते हैं.बीरबल का सहायक घड़े को लेकर आ गया.
तब बीरबल ने अकबर से कहा, “जहांपनाह, समझदारी से भरे घड़े तैयार है. मेरी बस एक शर्त है की, ये सारे घड़े खाली करके वापस लौटाने पड़ेंगे, वह भी बिना कोई नुकसान या किसी तोड़फोड़ के! और अगर आप समझदारी को बाहर निकलना चाहते हैं, तो उसे भी कोई चोट नहीं आनी चाहिए.”

राजदूत ने बीरबल से घड़े में रखी हुई चीज देखने की इच्छा जताई. तब बीरबल ने भी उसे घड़ा देखने की इजाजत दे दी.
जैसे ही राजदूत ने घड़े के ऊपर का कपड़ा उठाकर उसमें झांक कर देखा, तो वह भौचक्का रह गया.
बीरबल ने राजदूत से कहा, “हमारे पास ऐसे और पांच घड़े हैं. अगर आपके राजा को और समझदारी चाहिए, तो आप उन्हें भी ले जा सकते हैं.”

तभी राजदूत को उसकी चतुराई का पता चल गया. उसने बीरबल की भरपूर प्रशंसा करते हुए कहा, “आप लाखों में एक हो. आपके चतुराई का कोई जवाब नहीं.” और वह घड़ा लेकर चला गया.
बादशाह अकबर ने भी बीरबल की बहुत तारीफ की और उसे इनाम दिया.

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