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१७ अप्रैल: मौन दिवस (The day of Silence)

क्या आप जानते हैं क्या आज सब लोग चुप क्यों है? क्योंकि आज मौन दिवस है अर्थात डे ऑफ साइलेंस! यह दिवस सभी स्कूलों में घृणा, नफरत एवं उत्पीड़न के खिलाफ एलजीबीटी (LGBT) समुदाय का चेहरा बनकर उभर रहा है. क्या आपने सोचा ही यह दिन कैसे शुरू हुआ? इसे किसने शुरू किया? इस दिन का क्या महत्व है? आइए इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढें.

मौन दिवस का इतिहास

आपको शायद यह पता ही होगा कि डे ऑफ साइलेंस का आयोजन सबसे पहले वर्जिनिया विश्वविद्यालय में छात्रों के एक समूह द्वारा किया गया था. यह आयोजन मूल रूप से अहिंसा के तत्वों पर आधारित था. पहले ही वर्ष इसमें 150 से ज्यादा छात्रों ने भाग लिया था. एक साल बाद इसी समूह के छात्रों ने इस दिवस को 100 से अधिक विश्वविद्यालयों में मनाना शुरू कर दिया और इसका प्रचार एवं प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर होने लगा.इन समूहों की एकजुटता ने फिर एक बार विश्व को बता दिया कि एलजीबीटी और सहयोगी दलों पर हो रही नफरत, गुंडागर्दी, उत्पीड़न इत्यादि का समय अब खत्म हो गया है.


इसके बजाय इन्हें करुणा, प्रेम और आदर भाव की अत्यंत आवश्यकता है. अगर दुनिया ने चाहा तो इस स्थिति को वे हमेशा के लिए बदल कर रख सकते हैं.इस दिवस की भारी सफलता के बाद, डे ऑफ साइलेंस को 2001 में एलजीबीटी नेटवर्क को सौंप दिया गया. इनके ही नेतृत्व में इस दिन का आयोजन किया जाता है. वे हर साल इस दिन को मनाने के लिए कुछ स्टाफ, स्वयंसेवक एवं फंडिंग की मदद लेते हैं.

इनको सौंपे जाने के बाद इस दिन का महत्व भी बढ़ गया है और यह ज्यादा लोगों तक पहुंचने में सफल रहा है.इन सब बातों के चलते जल्द ही इस दिन मौन रहने वाले मुद्दों को संबंधित करने की कल्पना कामयाब रही ऐसा ही कहा जा सकता है.इसके अलावा यह दिन उन लोगों को भी सूचित करता है कि जो लोग इस तरह के मुद्दों की हद तक जागरूक नहीं हो सके. उनके लिए अधिक समर्थन और आकर्षक बातों का समुच्चय आवश्यक है. हालांकि यह सब उन पर व्यक्तिगत रूप से लागू नहीं की जा सकता.

इसके लिए वे खुद से इसमें भाग लेने के लिए उत्सुक होने चाहिए.डे ऑफ साइलेंस लोगो के मन में एलजीबीटी के खिलाफ होने वाली नफरत, घृणा, उत्पीड़न, पूर्वाग्रह जैसी कई भावनाओं पर विजय प्राप्त करने का दिवस है. इसमें भाग लेने वालों को मौन रहकर अपना संदेश सभी लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है. हम जानते हैं कि निसंदेह दुनिया सभी चीजों को लेकर सहिष्णु हो रही है. अब भी समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो इन भावनाओं को अपने जीवन पर शासन करने की अनुमति देते हैं. इस दिन मौन रखकर हम लोगों तक यह भी संदेश देना चाहते हैं कि अपने मन का पूर्वाग्रह दूर कर अगर किसी के पास कोई चीज नहीं है तो भी हमें उन्हें उनके दृष्टिकोण से देखना चाहिए, क्योंकि हम सभी मानव है. उनका मानना है कि आज के समाज के लिए कानून और दृष्टिकोण सबके लिए समावेशी होना चाहिए फिर चाहे उसकी लैंगिक अभिविन्यास कोई भी क्यों ना हो. डे ऑफ साइलेंस का दिन यही दिखाने का एक अच्छा तरीका है कि हिंसा को हिंसा से ही ना देखा जाए.

डे ऑफ साइलेंस कैसे मनाएं

अगर आपको इस समुदाय को कुछ मदद करने की इच्छा है तो आप पूरे दिन मौन व्रत धारण कीजिए. पूरे दिन चुप्पी साधते हुए किसी कुछ भी ना बोले. फिर चाहे आप एलजीबीटी समुदाय का हिस्सा हो या ना हो.
अगर आप किसी ऐसी जगह काम करते हैं या ऐसे संगठन का हिस्सा है जहां आप पूरे दिन चुप नहीं रह सकते, तब इस डे ऑफ साइलेंस के लिए अपना समर्थन दिखाने के लिए आप अपने आसपास के स्कूल, कार्यालय या फिर पड़ोस में पोस्टर या बैनर लगाकर भी शामिल हो सकते हैं.

यदि आप इनमें से कुछ भी ना कर पाए तो भी इंद्रधनुष जैसे अलग-अलग रंग के झंडे को आप अपने सोशल मीडिया पर जाहिर करके भी इस को समर्थन दे सकते हैं. अंत में हम आपको यही बताना चाहेंगे कि इस दिन पर आपको मौन ही क्यों रहना है? क्योंकि चुप रहना ही हमें किसी भी अजीब सवालों के जवाब देने से बचाता है और लोगों को खुद के लिए समय देने का अवसर भी मिल जाता है.

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