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आसान और कठिन के बजाय आवश्यक काम करने की ज्यादा जरूरत है

हर व्यक्ति कुछ न कुछ काम करके अपनी उपजीविका चलाता है. कुछ लोग दूसरों को देखकर काम करते हैं. कुछ अपने साथी जो करते हैं उसके विपरीत ही करते हैं. विरोध करना यही उनका एकमात्र कार्यक्रम रहता है.
कुछ लोग कहते हैं की मेरा किसी के साथ कुछ लेना-देना नहीं है, मैं सिर्फ वही करता हूं जो मुझे सही लगता है.
कुछ लोग जो आसान है, वही करते हैं, यह मुश्किल होगा, मुझसे ये नहीं होगा, मैं नहीं करूँगा, ऐसा कहने वाले भी बहोत है.

वास्तव में, जब हम पसंद-नापसंद, सरल-मुश्किल इन चीजों से परें होकर आवश्यक या अति आवश्यक काम को प्राप्त करने के लिए जुट जाते हैं, तभी हमे उसका लाभ होता है.

मुश्किल काम को आसान तरीकों से सोचने की तरकीब

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हम जब सोचते हैं की मुझसे यह काम नहीं होगा, तभी हमें वह मुश्किल लगने लगता है. मुश्किल समस्या को आसान बनाने के लिए, हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि इसे आसान कैसे करें. जो व्यक्ति ऐसे मुश्किल काम कर रहे हो या कर चुके हो, हम उनसे मदद ले सकते है.

एक कक्षा- अ अधिकारी के साक्षात्कार में साक्षात्कार कर्ताओं से पूछा गया, ‘आप जिस क्षेत्र में कार्यरत होंगे, वहां पांच से छह भाषाओं में संवाद करना पड़ सकता है, क्या यह आप के लिए संभव होगा?’ बहुत से उम्मीदवार इस प्रश्न का उत्तर ‘नहीं’ ऐसे ही दे रहे थे.

एक उम्मीदवार ने कहा, “यह संभव है. क्योंकि मैं क्षेत्रीय भाषा मराठी, राष्ट्रभाषा हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा भी समझता हूं, मैं लगातार सीख रहा हूँ और आगे भी सीखता ही रहूँगा. संचार, संपर्क, सलाह और अभ्यास से मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूँ कि मैं अन्य भाषाओं को भी तेजी से सीख लूंगा और जरूरत पड़ने पर दुभाषिक कर्मचारियों की मदद भी लूंगा. यदि संवाद का उद्देश्य काम करना है, तो मैं भाषा के कारणवश किसी का भी काम रुकने नहीं दूंगा.” सबको यह जवाब ठीक लगा और वह उम्मीदवार चुना गया.

आवश्यक कार्य आसान बनाना सीखें

कुछ लोगों को ‘यह मुझसे नहीं होगा’ ऐसा कहने की इतनी आदत लग चुकी है कि उन्हें कुछ भी पूछो उनका जवाब बस इसी तरह होता है, ‘मुझसे ना होगा, मुझे परवाह नहीं है, मैं नहीं कर सकता, तुम्हें उससे क्या, मुझे मरने दो, मुझे वैसे ही रहने दो,’ गैरकानूनी, अनावश्यक, बाहरी मामलों को जरूर नहीं कहना चाहिए.

अगर आप अपने क्षेत्र की उन चीजों को भी करने से इनकार करते हैं जो आपको करने की ज़रूरत है, तो हम बेकार, नालायक बन जाते हैं. हमेशा गैर लाभ की बात को छोड़ दिया जाता है. कभी-कभी ऐसे ना-ना कहनेवाले व्यक्ति को महत्वहीन, अनावश्यक काम दिया जाता है क्योंकि उसके पास कुछ काम नहीं होता है.

महत्वहीन कार्य करके कभी कोई महत्वपूर्ण नहीं बन सकता.

सरकारी नौकरी में किसी तरह उनको बर्दाश्त कर सकते है, लेकिन निजी क्षेत्र में उन लोगों को सीधे बाहर का रास्ता दिखाया जाता है. ‘असंभव बात प्राप्त करने के लिए उस चीज का अभ्यास हो जाना, यही सिद्धि का कारण हो सकता है.’इसी बात को समझते हुए यदि हम आवश्यक कार्य करते रहे तो धीरे-धीरे मुश्किल कार्य भी आसान लगता है. जन्म के तुरंत बाद ही कोई दौड़ना नहीं सीखता. धीरे-धीरे चलने के बाद ही दौड़ना सीखा जा सकता है. यदि एक-एक कदम सही दिशा में उठाया जाए, तो यह यात्रा सफल हो सकती है.

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माँ के गर्भ से कोई सीखकर नहीं आता है. हमे आज जो-जो चीजें आती है, हमने वो किसी ना किसी से सीखी है, या किसी ने हमे सिखाई है. हमेशा दिल से सीखने की इच्छा रखनी चाहिए. यदि उस बात की आवश्यकता है, तो निश्चित रूप से वह हासिल की जा सकती है. एक कदम उठाकर तो देखिये, पिछला पैर आगे बढ़ने के लिए तैयार ही है.

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© डॉ.हनुमंत भोपाळे
(समुपदेशक तथा व्यक्तिमत्व विकासतज्ज्ञ )
शंकरराव चव्हाण महाविद्यालय, अर्धापूर, जि.नांदेड (महाराष्ट्र)
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