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कैसे हम नहीं कहकर भी अपनी सकारात्मक्ता बरक़रार रख सकते है?

दोस्तों, हम ना, नहीं, बिल्कुल नहीं इन शब्दों को नकारात्मक समझते हैं और है, हा, होगा आदि शब्दों को सकारात्मक. सहि भी है ये बात ..! लेकीन इसिके साथ कुछ लोग मन में ऐसी धारणा भी बना लेते हैं कि नकारात्मक शब्दों से ज्यादा सकारात्मक शब्दों का उपयोग करना है . वो ज्यादा से ज्यादा किसी भी बात को स्वीकारने कि कोशिश करते हैं.

किसी की “हां” मैं “हां”मिलाते हैं.जब की उन्हें मालूम होता है ,की ये बात उनके लिए नहीं है. फिर भी केवल किसी व्यक्ति का मन रखने के लिए वे ऐसा करते हैं . हा कहकर भी वो अपना काम या फिर बताई गई बाते अपने जीवन में नहीं लाते.क्या ये सही बात है..?

किसी भी काम के लिए “हा”कहने के बाद उसे पूरा करने की जिम्मेदारी हमें निभानी होती है.पर जब वो बात हमने मन से स्वीकार की नहीं होती इसलिए हम वो जिम्मेदारी नहीं निभा पाते हैं.किसी काम को स्वीकार करने के बाद भी अगर हम अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं,तो हम खुद के शब्दों का ही अपमान करते हैं. जिससे हम अपने आप को हर किसी की नजरों में एक ऐसा इंसान बनाते है जिस पर कोई भरोसा नहीं करना चाहेगा.

“नहीं” के बारे में अपनी अलग सोच

नहीं,एक नकारात्मक शब्द होने के साथ ही अपने आप को किसी भी बुरी चीज को स्वीकार करने से बचाता है. किसी को मना करने से हो सकता है कि उसके दिल को आहत हो…लेकिन हम एक भरोसेमंद व्यक्ति तो बन जाते हैं उसकी नज़रों में.

किसी को मना करने से “नहीं”कहने से हम अच्छे या बुरे नहीं बनते बल्कि हम किस बात के लिए मना करते हैं और किस बात को स्वीकार करते हैं इसपर अपना व्यक्तित्व निर्भर करता है.

कुछ लोग ऐसा सोचते है कि जीवन में अपनीसकारात्मक सोच होना जरूरी है.किसी को सीधा मना नहीं करना हैं,या फिर ज्यादा से ज्यादा सकारात्मक शब्दों का उपयोग करना है. लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हम किसी भी गलत चीजों को अपने जीवन में लाए. अच्छे बुरे की सोच – समझ रखते हुए हमें हा और ना का प्रयोग करना चाहिए.

“नहीं” क्यों कहे? और कहा?

हमें “नहीं”वहा कहना जहा हम किसी बात के लिए तैयार नहीं है.हो बात हमे पसंद नहीं है उसे मना करना है. जो जिम्मेदारी उठाने के लिए हम काबिल नहीं है उसमें बेवजह हामी भरने खुदको और दूसरों को भी हानि पहुंचाता है.इसलिए जहा हम किसी चीज को पूरा करने के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं समझते हैं तो हमें मना करना है.   

जहा बात सीखने की हो वहा गलतियां होना सही बात है.जिम्मेदारी उठा ली और उसे अच्छे से निभाया,हमेशा ऐसा ही हो ये ज़रूरी नहीं है.हो सकता है नई जिम्मेदारियां संभालते हुए हम गलतियां करे ,लेकिन हमें उससे सीख मिलती है.

इसलिए जिम्मेदारी उठाने से पहले अपने आप को परखें , उस विश्वास को संपादित करें जो किसी भी जिम्मेदारी को निभाने के लिए जरूरी होता है. फिर उसे स्वीकार कीजिए.     

केवल किसी भी व्यक्ति का दिल रखने के लिए हा कहना ग़लत बात है.”नहीं” कहने से हो सकता है सामने वाला व्यक्ति नाराज हो जाए ,लेकिन उसका भरोसा हम बनाए रखते हैं. उस व्यक्ति के लिए हम एक भरोसेमंद इंसान बन जाते हैं.इसलिए हमें “नहीं”कहा कहना है, इसे सोच समझ कर तय करना होगा.जिससे हम खुद को एक सही और नेक इंसान की पहचान दिला सके.

“नहीं”कहने से होने वाले फायदे 

केवल किसी भी बात को मना करना है इसलिए हम “नहीं” शब्द का उपयोग नहीं करते हैं,बल्कि गलत चीजों को स्वीकार ने के लिए मना कर पाते हैं.कोई हमें झूट का साथ देने के लिए कहे तो हमे उसे वहीं सीधे शब्दों में “नहीं,ये में नहीं कर सकता/सकती” कहकर मना करना है.इससे हम उन चीजों से दूर रहते जो हमारे लिए आवश्यक नहीं है.   

कुछ लोग आसानी से किसी चीज के लिए मना नहीं कर पाते हैं. इससे उन्हें अनगिनत गलतियों का शिकार होना पड़ता है.कुछ लोगों को हा में हा मिलाने की आदत होती है. ऐसे लोग भरोसे के लायक नहीं होते है,उनके शब्दों की कोई कीमत नहीं होती है. वहीं ना कहने वाले लोग ज्यादा भरोसेमंद और शब्दों को महत्व देने वाले साबित होते हैं.

किसी इंसान के शब्दों को महत्व देना यानी उस व्यक्ति को महत्व देने जैसा है, ऐसा करने से उस इंसान को भी जिंदगी में महत्व प्राप्त हो जाता है. नहीं कहने से हो सकता है कि किसी का दिल टूट जाए लेकिन वह इंसान झुटी तसल्ली का शिकार नहीं बनता जिसके लिए वो हमारा शुक्रगुजार ही होगा.

कुछ समय पश्चात वह इंसान भी इस बात के लिए सुकून महसूस करेगा कि हमें झुटी तसल्ली नहीं मिली. कुछ लोग झुटी तसल्ली देते हैं जिस कारण समय का नुकसान होता है और साथ ही उस इंसान को भी हानि पहुंचती है जो भरोसा रखता है. उससे सही बात ये है कि हम उन्हीं बातों को हा कहे , जिन्हें हम स्वीकार कर सकते हैं.

नहीं कहने के तरीके, नहीं कैसे कहे ?

नहीं कहते हुए विनम्रता से कहे
अगर हम किसी को किसी चीज के लिए मना कर रहे है तो विनम्रता से कहे. किसी को दुख हो इस प्रकार से हम ना बोले. अगर किसी को किसी वस्तु की जरूरत हो और हम उसे देने के लिए हम समर्थ है फिर भी हम किसी कारण नहीं देना चाहते हैं तो विनम्रता से उन्हें मना करे.

नहीं कहते समय उसका उचित कारण दे
अगर किसी व्यक्ति को हम मना कर रहे हैं तो हमें उसे उसका उचित कारण देना चाहिए. जरूरी नहीं कि हमेशा हम हर बात का स्पष्टीकरण दें, लेकिन सामने वाले व्यक्ति को उचित कारण मालूम हो जाए तो उसे भी आपके प्रति कोई संदेह या फिर बुरा भाव नहीं रहेगा. इससे दोनों के बीच के संबंध जैसे थे वैसे ही रहेंगे वह खराब नहीं होंगे.

अपना नकार स्पष्टता पूर्वक दर्शाए
यदि हम किसी को नहीं कहना चाहते हैं तो उसे स्पष्टता पूर्वक कहे. उसे अनदेखा करके अपनी “ना” को ना दर्शाए.इससे आपसी संबंध बिगड़ सकते है.

पूरे धैर्य और आत्मविश्वास के साथ नहीं कहना सीखे
कभी कभी कुछ चीजों में हम संभ्रमित हो जाते हैं. लुभावनी वाली चीजें अक्सर हमें पसंद आती है, जिन्हें हम मना नहीं कर पाते पर यह जानते हैं कि वह हमारे लिए लाभदाई नहीं होती है. ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास के साथ नहीं कहना सीखें. यह बात आपके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव लाएगी साथ ही गलत संगत में जाने से भी रोकेगी.

मनोगत 

एक समय था, जब मैंने खुद से यह तय किया था की किसी भी बात को नहीं कहने के बजाय हां कह कर पूरा करना. जिससे जीवन सकारात्मक हो जाएगा. पर यह बात मैं ज्यादा समय तक निभा नहीं पाई. जहा मुझे एहसास हुआ कि ऐसी अनगिनत परिस्थितियां है जहां स्पष्ट रूप से “नहीं” कहना जरूरी है.   

हमें जीवन में सही और गलत की परख होना बहुत जरूरी है. जो चीजें हमारे लिए अच्छी है उन्हें स्वीकार ना जितना जरुरी है उतना ही जो चीज है हमारे लिए हानिकारक है उन्हें नकारना है. जीवन में “हा”कहने का जितना महत्व है उतना ही महत्व”नहीं” का भी है. जिसे नकारात्मक रूप से ना लेते हुए सकारात्मक रूप से ले सकते हैं. जिससे हम अपने जीवन का आनंद ले सकेंगे.

✍🏽 Author
– Vrushali Suvarna Dyandev

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One Comment

  1. Santosh Santosh

    वृषाली जी,
    सच कहा आपने, नहीं कहना भी कभी कभी हमारे लिए बहोत फायदेमंद साबित होता है
    बहोत बढ़िया लेख

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