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व्यवसाय करने के लिए पैसे कैसे जुटाएं?

प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक रॉबर्ट कियोसाकी का एक प्रसिद्ध वाक्यांश है, “अमीर अपने पैसे इन्वेस्ट करते हैं और जो बचता है उसे खर्च करते हैं, गरीब अपना पैसा खर्च करते हैं और जो बचता है उसे इन्वेस्ट करते हैं”. यहां एक उदाहरण दिया गया है कि आम लोग खर्च को कैसे संपत्ति मान लेते हैं. एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के पास शुरू में कुछ ऋण होता है. अपना बेटा बड़ा होकर ऋण चुकायेगा इस उद्देश्य से उसे स्कूल में भेजा जाता है.

उसकी कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के लिए उसे पुनः एक बार ऋण लेना पड़ता है. अपनी कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद वह ऋण चुकाने और पैसे कमाने के लिए कोई छोटा-बड़ा काम करना शुरू कर देता है. ऋण का भुगतान करने के बाद वह अपने दोस्तों की ओर देखकर उनके जैसा ही नया बंगला, कार, आईफोन, एयर कंडीशनर, आदि लेता है और जीवनभर अपने ऋण की किस्तें चुकाता फिरता है.

पैसे कमाना आसान भी नहीं और मुश्किल भी नहीं

लगभग हर जगह यही हाल है. यही सिलसिला अनायास चालू रहता है. रॉबर्ट इसे ‘रैट रेस’ मतलब चूहों की दौड़ कहते हैं. रैट रेस में व्यक्ति अपने ऋण का और सरकारी करों का भुगतान करने के लिए ही जीवन भर काम करता रहता है.इस चूहा दौड़ से बाहर निकलने के लिए लागत और धन के बीच के अंतर को इसे समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है. आपके द्वारा प्राप्त वित्तीय स्वतंत्रता आपकी इसी समझ पर निर्भर करती है.

सीधे शब्दों में कहें तो खर्च एक ऐसी चीज है जो आपकी जेब से लगातार पैसा निकालती रहती है और धन एक ऐसी चीज है जो बाहर से लगातार आपकी जेब में पैसा जमा करती जाती है.

सामान्य लोग सबसे पहले खर्च करते हैं और बाकी बचा हुआ पैसा निवेश करते हैं. जबकि धनवान लोग इसके बिल्कुल उल्टा करते हैं. वे सबसे पहले बचत और निवेश करते हैं, उसके बाद बचे हुए पैसों को खर्च करते हैं. धनवान लोग अपने पास मौजूदा धन को काम पर लगाते हैं याने की उस धन का ठीक तरीके से उपयोग करते हैं और अधिक धन कमाते हैं. जबकि साधारण लोग अपना समय बेचते हैं और निश्चित किए हुए दरों पर पैसा कमाते हैं. बहुत से लोग यह मानते हैं कि ज्यादा पैसा कमाने के लिए या फिर कोई व्यवसाय करने के लिए आपके पास पहले से ही बहुत पैसा होना जरूरी होता है. लेकिन आज यह बात पुरानी हो गई है. आइये इसका एक उदाहरण देखते है.

कम खर्च में ज्यादा पैसे कमाना सीखिए

यह बात पुणे विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज की है.दिवाली के पहले का समय था. हमेशा की तरह कॉलेज ने डिटेन सूची यानी कि कक्षाओं में अनुपस्थित रहने वाले छात्रों की एक सूची बनाई थी. अब हर एक विभाग को सबमिशन और उससे भी अधिक डिटेन सूची के पैनल्टी की उत्सुकता लगी हुई थी. आपकी जानकारी के लिए बता दें, की इंजीनियरिंग कॉलेजों में 75% की उपस्थिति ना होने पर छात्रों को डिटेन किया जाता है.

इन छात्रों को फिर से रिटेन करने के लिए 500 से 1000 रुपए तक कॉलेज के अनुसार प्रति एक प्रतिशत इस भाव से उन छात्रों को उनकी ही उपस्थिति बेची जाती है. पैसों की मदद से छात्रों की उपस्थिति का प्रतिशत बढ़ाना और विश्वविद्यालय भेजना भारतीय शिक्षा बाजार में एक छोटासा टीज़र है. अब आपको पता चल गया होगा की हर कॉलेज की तरह इस कॉलेज की भी स्थिति समान ही थी.

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दिलीप अपने दोस्तों के साथ कॉलेज अटेंड करने के लिए गुजरात से पुणे के एक कॉलेज में आया था. वहां पर रहने का खर्च निकाल पाने के लिए और खुद का एक इनकम स्त्रोत तैयार करने के लिए कॉलेज के साथ-साथ वह स्टेशनरी बेचने का साइड बिजनेस भी करता था. इस तरह से उसका कॉलेज का खर्च निकल जाता था. लेकिन यह काम करते समय वह कॉलेज में लंबे समय तक अनुपस्थित रहा और उसे डिटेन किया गया. अब उसे अपना सबमिशन पूरा करने के लिए करीब 15000 रुपयों की आवश्यकता थी, जो कि बहुत ज्यादा थे.

उसे उसके व्यवसाय में सब खर्च निकाल कर भी सिर्फ रु. 1000 का लाभ होता था. अब इतने कम समय में व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए पैसा कमाना लगभग असंभव था. इसीलिए वह एक ऐसा व्यवसाय खोज रहा था, जो कम समय में अधिक भुगतान करें और वह भी रु. 1000 जितने कम निवेश पर! और जल्द ही उसे वह मिल भी गया. 

बड़ी संख्या में ग्राहकों को सर्विस देकर ज्यादा मुनाफा कमाएं

उसने आने वाली दिवाली के लिए पटाखे बेचने का फैसला किया. उसने फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, और साथ ही पर्चे, पोस्टर जैसे ऑफलाइन माध्यम से विज्ञापन दिया कि लोगों को बाजार दर से 20% सस्ती आतिशबाजी के पटाखे मिलेंगे; लेकिन इसके लिए उन्हें ऑर्डर बुक करना और पेमेंट पहले करना जरूरी है.

उसने इन विज्ञापनों पर रु. 500 खर्च किए और बाजार से रु. 300 के पटाखों के नमूने लेकर आया. कॉलेज, छात्रावासों और दोस्तों के घरों के आसपास और पड़ोस में भी वह खुद जाकर ऑर्डर बुक करने लगा. कुछ लोगों ने ऑनलाइन ऑर्डर करना शुरू कर दिया. केवल 4 दिनों में ही उसके पास 60 हजार रुपए के ऑर्डर्स आ चुकी थी.

जिस किसी ने भी आतिशबाजी के क्षेत्र में व्यापार किया है वह जानता है कि इस व्यवसाय में 50 से 60% का मार्जिन रहता है. पैसे जुटाकर वह पटाखे खरीदने के लिए थोक व्यापारी के पास गया. यहां तक कि उस व्यापारी से भी उसने अधिक सौदेबाजी के साथ खरीद का मूल्य और भी कम कर लिया.
40 हजार रुपयों में उसने वह स्टॉक उठाया और ऑर्डर दिए हुए घरों तक उसको पहुंचाया.

यात्रा की आवागमन का खर्च और अन्य छोटे खर्चों में कटौती करने के बाद, उसके पास 18000 रुपए बच गए थे और यह सब माया उस ने केवल एक सप्ताह में जमा की थी.

व्यवसाय के लिए दिलीप ने जिस सिद्धांत का उपयोग किया उसे ‘ऐसेट लाइट’ या ‘एग्रीगेटर मॉडल’ कहते हैं. इसमें सिर्फ ग्राहकों को खोजना जरूरी होता है. बड़ी संख्या में ग्राहकों की खोज करने के बाद उन्हें उन विभिन्न सामानों या सेवाओं की आपूर्ति करनी होती है, जो वे सही विक्रेताओं से चाहते हैं.अमेजॉन-फ्लिपकार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियां तथा जोमैटो-स्विग्गी जैसी फूड कंपनियां, ओयो रूम्स-फैब होटल्स जैसी होटल सर्विस कंपनियां या फिर ओला-उबर जैसी कैब सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनियां इसी सिद्धांत पर काम करती हैं. ये कंपनियां लाखों ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करती हैं.

बड़ी संख्या में ग्राहक होने के कारण और लगातार उसी ग्राहक को अपने प्रोडक्ट या सर्विस देने के कारण यह कंपनियां अरबों रुपए कमा लेती है. 

दरअसल इन कंपनियों के द्वारा बेचे जाने वाली चीजे मूल रूप से उनकी होती ही नहीं. वे सिर्फ बड़ी संख्या में ग्राहकों को और विक्रेताओं को करीब लाते है और अधिक पैसा कमाते है. इसी सिद्धांत पर अब नए व्यवसाय उभर रहे हैं. इस बात से रॉबर्ट कियोसाकी का वाक्यांश फिर एक बार सच होता है कि, “पैसा बनाने के लिए या व्यवसाय करने के लिए पैसे की जरूरत नहीं होती.”

© रियाज शेख
(लेखक सौर ऊर्जा के क्षेत्र में व्यावसायिक है)
मो: +91 7378926295