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बीरबल की कहानी- मूर्खों की दावत : Short Hindi Story

एक दिन बादशाह अकबर ने अपने वजीर बीरबल से कहा, “बीरबल, मेरे मन में एक ख्याल आया है. मैं अपने राज्य के चार सर्वोत्तम मूर्खों को दावत देना चाहता हूं. उन चारों मूर्खों को ढूंढकर लाने की जिम्मेदारी मैं तुम्हें सौंपता हूं.” तब बीरबल ने ‘जी जरूर, जहांपनाह’ कह कर उनसे विदा लिया.

लेकिन अब बीरबल खुद सोच में पड़ गया कि, बादशाह के लिए ऐसे चार सर्वोत्तम मूर्ख कहां से ढूंढ कर लाए.उसी वक्त एक आदमी बोझ को अपने सिर पर लादे हुए गधे पर बैठकर चला जा रहा था. बीरबल ने उससे पूछा, “यह बोझ तुमने अपने सिर पर क्यों रखा है? यह तो तुम अपने गधे पर भी रख सकते हो.” तब उस आदमी ने कहा, “हां, हां, मैं जानता हूं, मगर यह बोझ मैंने इस गधे पर रखा तो बोझ के भार से मेरा गधा मर जाएगा. इसलिए मैंने इसे अपने सर पर रखा है.”

बिरबल को उसके उत्तर पर बडी हंसी आई.उसने सोचा, “यही है वह मूर्ख जिसकी बादशाह को तलाश है.” और वह उस आदमी को साथ लेकर दरबार की तरफ चल पड़ा. 

कुछ दूर चलने के बाद बीरबल को एक आदमी चांद की रोशनी में कुछ ढूंढते हुए नजर आया.उसने पूछा, “तुम क्या ढूंढ रहे हो?” तो वह आदमी बोला, “मैं अपनी अंगूठी ढूंढ रहा हूं.” बिरबल ने उससे पूछा, “लेकीन तुम्हारी अंगूठी कहां खो गई है?” आदमी बोला, “मेरे घर के पास.” बीरबल ने फिर पूछा, “तो फिर तुम यहां क्यों ढूंढ रहे हो?” बिरबल से वह आदमी बोला, “वहां अंधेरा है, यहां रोशनी है. इसलिए रोशनी में ढूंढ रहा हूं.”बीरबल ने उस आदमी को भी अपने साथ लिया. 

दूसरे दिन बीरबल उन दोनों को लेकर बादशाह अकबर के पास चला गया. अकबर बादशाह ने बीरबल से कहा, “बीरबल, ये तो सिर्फ दो ही मूर्ख है. बाकी दोनों कहां है?” बीरबल ने बादशाह से माफी मांगते हुये कहां, “माफ कीजिए जहांपनाह. गुस्ताखी माफ हो, लेकिन बाकी दो मूर्ख भी यही खड़े है. हम दोनों.” अकबर ने गुस्से में पूछा, “क्या?” तब बीरबल ने नम्रता पूर्वक जवाब दिया, “अपनी प्रजा के हित में करने लायक इतने सारे काम छोड़ कर आप मूर्खों को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं और मैं उन मूर्खों को ढूंढने बाहर निकला हूं.” 

बिरबल के इस वाक्य पर अकबर बादशाह को बहुत हंसी आई. इस तरह बादशाह को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह प्रजा हित के कामों में जुट गया.

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